Monday, 2 May 2016

आयुर्वेदिक मसाज थेरेपी के लिए केरल है हॉट स्पॉट



व्यस्तता भरी जिंदगी में हर इंसान यही सोचता है कि वह अपने शरीर के थकान और तनाव को कैसे दूर करे। इसके लिए वह तरह-तरह के उपाय सोचता है लेकिन फिर भी ऐसे साधन नहीं जुटा पाता जिससे वह अपने तनाव को कुछ दिनों के लिए दूर रख सके। आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सीय पद्धति है जिसका इस्तेमाल भारत में पिछले 5000 सालों से शरीर के उपचार के लिए किया जाता रहा है।

भारत की प्राचीन पद्धति

आयुर्वेदिक मसाज थेरेपी भारत की सबसे प्राचीन मसाज थेरेपी है जिसमें आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और हर्बल ऑयल के माध्यम से शरीर की मसाज की जाती है। शरीर को सुडौल बनाने, दर्द कम करने, थकान मिटाने और तनाव कम करने जैसे कई गुणों से भरी मसाज थेरेपी आज भारत में लोकप्रिय है। आयुर्वेदिक उपचार का सही समय मानसून के दौरान जून से सितंबर के बीच होता है क्योंकि इस समय वातावरण नम, ठंढा और धूल रहित रहता है, जिससे आपका शरीर हर्बल ऑयल को ज्यादा से ज्यादा ग्रहण करता है।

इसमें प्रयोग लाई जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियां मेटाबालिज्म, स्ट्रेस और चिरकालिक रोगों के लिए एक बेहतर और प्रभावशाली उपाय है। कीमोथेरेपी और अन्य दूसरी बीमारियों के लिए इसका काफी उपयोग किया जाता है। इसका प्रयोग पुनयरवन और सौंदर्य कार्यो के लिए भी होता है। अगर आप इस पद्धति के जरिए अपना उपचार कराना चाहते हैं तो अपको कम से कम दो हफ्ते का समय देना पड़ेगा। इस दो हफ्ते के कोर्स में हर्बल और अन्य जड़ी-बूटियों के जरिए आपकी मालिश या मसाज की जाएगी।

कहां से कराएं आयुर्वेदिक उपचार

आबोहवा और औषधीय जड़ी-बूटियों की भारी मात्रा में मौजूदगी होने की वजह से केरल के अधिकतर क्षेत्र आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति के लिए उपयुक्त माने जाते रहे हैं। केरल के अलावा गोवा और कर्नाटक के आयुर्वेदिक हस्पताल, आयुर्वेदिक रिजॉर्ट और यहां तक पांच सितारा होटलों में इस तरह के उपचार किए जाते हैं। आप आयुर्वेदिक हाउसबोट में भी इसकी सेवा ले सकते हैं। इसके लिए आपको पहले से ही बुक करवाना होगा।

उपचार के लिए ढीली करें जेब

1.अगर आप आयुर्वेदिक मसाज के जरिए अपना उपचार कराना चाहते हैं तो आपके लिए सबसे सस्ती जगह आयुर्वेदिक हॉस्पिटल होगा। यहां मात्र एक हजार डॉलर में आप अपना उपचार करा सकते हैं। इसके लिए आपको 20-30 दिन का समय देना होगा।

2. आप रिजॉर्ट में भी इस चिकित्सीय पद्धति के जरिए अपना इलाज करा सकते हैं। यहां आपको एक दिन के लिए 60 से 100 डॉलर खर्च करने पड़ेंगे।

3.यदि आप आयुर्वेदिक हाउसबोट के जरिए अपना उपचार करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको 1000-1500 डॉलर खर्च करने पड़ेंगे

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हरि तक पहुंचने का द्वार है हरिद्वार




पवित्र धार्मिक स्थलों वाले भारत देश में जब कभी भी श्रद्धालु मोक्ष की तलाश में इधर-उधर भटकते हैं तो उन्हें धर्म की नगरी हरिद्वार याद आती है। 'हरिद्वार' का शाब्दिक अर्थ है, 'हरि तक पहुंचने का द्वार'। उत्तराखंड में पवित्र गंगा नदी के किनारे बसा हरिद्वार भारत के सात सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है। हरिद्वार के अलावा इसमें अयोध्या, मथुरा, वाराणसी, कांचीपुरम, उज्जैन, द्वारका शामिल हैं। यह जगह सदियों से पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करता आ रहा है।

पौराणिक इतिहास

हरिद्वार शिवालिक पहाड़ियों के कोड में बसा हुआ हिन्दू धर्म के अनुयायियों का प्रसिद्ध प्राचीन तीर्थ स्थान है। यहां पहाड़ियों से निकल कर भागीरथी गंगा पहली बार मैदानी क्षेत्र में आती है। हिंदू धर्मग्रंथों में हरिद्वार को कपिल्स्थान, मायापुरी, गंगाद्वार जैसे विभिन्न नामों से पुकारा गया है। हरिद्वार का प्राचीन पौराणिक नाम 'माया' या 'मायापुरी' है, जिसकी सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में गणना की जाती थी। ऐसा कहा जाता है कि चीनी यात्री युवानच्वांग ने भारत यात्रा के दौरान इसी शब्द का 'मयूर' नाम से वर्णन किया था। महाभारत में इस स्थान को 'गंगाद्वार' कहा गया है। इस ग्रंथ में इस स्थान का प्रख्यात तीथरें के साथ उल्लेख है।

यह पवित्र स्थल चार धाम का प्रवेश द्वार भी है। गंगा के उत्तरी भाग में बसे हुए 'बदरीनारायण', 'केदारनाथ' नामक भगवान विष्णु और शिव के प्रसिद्ध तीथरें के लिये इसी स्थान से मार्ग जाता है। इसीलिए इसे 'हरिद्वार' तथा 'हरद्वार' दोनों ही नामों से अभीहित किया जाता है।

भारतीय पुराणों में ऐसी मान्यता है कि हरिद्वार में समुद्र मंथन से प्राप्त किया गया अमृत गिरा था। तभी से यहां बारह वर्ष में आयोजित होने वाले कुंभ के मेले का आयोजन किया जाता है। कुंभ मेले के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भी इस शहर की पवित्र नदी गंगा में डुबकी लगाने और अपने पापों का नाश करने के लिए वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना यहां लगा रहता है।

महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल हर की पौड़ी

भारत के सबसे पवित्र घाटों में से एक हर की पौड़ी को ब्रह्मकुंड ने नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि यह घाट विक्रमादित्य ने अपने भाई भतृहरि की याद में बनवाया था। हर रोज संध्या के वक्त यहां महाआरती आयोजित की जाती है जिसे देखकर एक अलग ही अनुभूति होती है।

हर की पौड़ी के पीछे के बलवा पर्वत की चोटी पर मनसा देवी का मंदिर बना है। हरिद्वार जाने वाले श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करना नहीं भूलते। मंदिर तक जाने के लिए पैदल रास्ता है।

चंडी देवी मंदिर

गंगा नदी के दूसरी ओर नील पर्वत पर चंडी देवी मंदिर बना हुआ है। कहा जाता है कि आदिशंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में चंडी देवी की मूल प्रतिमा यहां स्थापित करवाई थी। बाद में इस मंदिर को कश्मीर के राजा सुचेत सिंह द्वारा 1929 ई. में बनवाया गया था। चंडीघाट से 3 किलोमीटर की ट्रैकिंग के बाद यहां पहुंचा जा सकता है।

माया देवी मंदिर

माया देवी मंदिर को भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में एक माना गया है। कहा जाता है कि शिव की पत्‍‌नी सती का हृदय और नाभि यहीं गिरा था। यह मंदिर हरिद्वार से कुछ ही दूरी पर स्थित है।

सप्तऋषि आश्रम

सप्तऋषि आश्रम की खूबसूरती की अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इसके सामने गंगा नदी सात धाराओं में बहती है इसलिए इस स्थान को सप्त सागर भी कहा जाता है। इसके पीछे की मान्यता यह है कि जब गंगा नदी बहती हुई आ रही थी तो यहां सात ऋषि गहन तपस्या में लीन थे। गंगा ने उनकी तपस्या में विघ्न नहीं डाला और स्वयं को सात हिस्सों में विभाजित कर अपना मार्ग बदल लिया।

भारत माता मंदिर

भारत माता मंदिर सप्त सरोवर हरिद्वार में आश्रम के पास में स्थित अपनी ही तरह का एक पवित्र स्थान है। यह मंदिर भारत माता को समर्पित है। वर्ष 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस मंदिर का उद्घाटन किया था। इस मंदिर में आठ मंजिलें हैं एवं यह 180 फुट की उंचाई पर स्थित है।


कैसे पहुंचें वायुमार्ग से यहां पहुंचने के लिए देहरादून में स्थित जौली ग्रांन्ट एयरपोर्ट नजदीकी एयरपोर्ट है। एयरपोर्ट से हरिद्वार की दूरी लगभग 45 किमी. है। वहां पहुंचने के लिए बस या टैक्सी की सेवा ली जा सकती हैं।

हरिद्वार रेलवे स्टेशन भारत के अधिकांश हिस्से से जुड़ा हुआ है। हरिद्वार के लिए दिल्ली से देहरादून जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस एक उपयुक्त ट्रेन है।

हरिद्वार आप सड़क मार्ग से भी पहुंच सकते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग 45 हरिद्वार से होकर जाता है। यहां जाने के लिए राज्य परिवहन निगम की बसें अपनी सेवाएं मुहैया कराती हैं।
 
     
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Sunday, 1 May 2016

कबाड़ से बना एक खूबसूरत गार्डन



रॉक गार्डन चंडीगढ़ का प्रमुख पर्यटक आकर्षण है। चंडीगढ़ खूबसूरत शहरों में शुमार है जो दो राज्यों की राजधानी है। चंडीगढ़ के रॉक गार्डन को नेकचंद रॉक गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। इस गार्डन को नेकचंद ने 1958 में बनवाया था। चंडीगढ़ आने वाले पर्यटन रॉक गार्डन आना नहीं भूलते हैं। इस गार्डन को बनवाने में औद्योगिक और शहरी कचरे का इस्तेमाल किया गया है। पर्यटक यहां की मूर्तियों, मंदिरों, महलों आदि को देखकर अचरज में पड़ जाते हैं। रॉक गार्डन में वाटरफॉल, पूल और घूमावदार रास्ते सहित 14 लुभावने चैंबर हैं, जो नवीनता और कल्पनाशीलता को दर्शाते हैं। इस गार्डन में कई मूर्तियां हैं, जो घर के बेकार समानों जैसे टूटी हुई चूड़ी, चीनी मिट्टी के बर्तन, तार, ऑटो पार्ट्स और ट्यूब लाइट से बनी हैं। भवन के कचरे, खेलने की गोलियां और टेराकोटा बर्तन को भी गार्डन में भवन, मानवीय चेहरा और जानवर सहित अनेक रूपों में प्रदर्शित किया गया है। यह अद्भुत गार्डन हर दिन सुबह 9 बजे खुल जाता है। गार्डन में झरनों और जलकुंड के अलावा ओपन एयर थियेटर भी देखा जा सकता है। यह रॉक गार्डन चंडीगढ़ में सुखना झील के नजदीक है।

खुलने और बंद होने का समय

(अप्रैल से सितंबर)- सुबह 9 से 1 बजे तक और 3 बजे से शाम 7 बजे तक।

(अक्टूबर से मार्च)-सुबह 9 से 1 बजे तक और 2 बजे से शाम 6 बजे तक।

बोली जाने वाली भाषाएं

हिंदी, पंजाबी और अंग्रजी




पता
कैपिटल कॉम्प्लेक्स और सुखना लेक के बीच, सेक्टर-1, चंडीगढ़

कैसे पहुंचे

भारत के हर हिस्से से हवाई, रेल और सड़क मार्ग से चंडीगढ़ आसानी से पहुंचा जा सकता है।
       
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अजमेर: सभी धर्मो का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल



अजमेर राजस्थान का पाचवां बड़ा शहर है। पहले इसे अजमेरे या अजयमेरु के नाम से जाना जाता था। पर्वतीय क्षेत्र में बसा अजमेर अरावली पर्वतमाला का एक हिस्सा है। देश के सबसे पुराने पहाड़ी किलों में से एक तारागढ़ किला अजमेर शहर की रक्षा करता है। अजमेर में पान की खेती भी होती है। इसकी महक और स्वाद गुलाब जैसी होती है।

पर्यटन

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह

दरगाह अजमेर शरीफ का भारत में बड़ा महत्व है। ख्वाजा मोइनुद्धीन चिश्ती की दरगाह-ख्वाजा साहब या ख्वाजा शरीफ अजमेर आने वाले सभी धर्मो के लोगों के लिए एक पवित्र स्थान है। सूफी संत ख्वाजा मोइउद्दीन चिरती की दरगाह पर हर साल उर्स का आयोजन होता है। विश्व प्रसिद्ध अजमेर उर्स के मौके पर लाखों लोग चादर चढ़ाने आते हैं। चांदी के दरवाजे वाली इस दरगाह का निर्माण कई चरणों में हुआ जहां संत की मूल कब्र है जो संगमरमर की बनी है। मक्का के बाद सभी मुस्लिम तीर्थ स्थलों में इसका दूसरा स्थान हैं, इसलिए इसे भारत का मक्का भी कहा जाता हैं।

आनासागर झील

अजमेर शहर के बीच बनी यह सुंदर कृतिम झील यहां का सबसे रमणीक स्थल है। आनासागर झील 13 किमी के क्षेत्र में फैली है जो पृथ्वी राज चौहान के पितामह अनाजी चौहान द्वारा निर्मित की गई थी। इसके जल में संध्या के समय किनारे पर खड़े विशाल नाग पहाड़ का प्रतिबिंब झलकता है।

पुष्कर, अजमेर

पुष्कर राजस्थान के अजमेर जिले में एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थान है। पुष्कर राजस्थान में विख्यात तीर्थस्थान है। पर्यटकों का स्वर्ग तीर्थराज पुष्कर में प्रतिवर्ष प्रसिद्ध 'पुष्कर मेला' लगता है जिसमें बड़ी संख्या में देशी-विदेशी पर्यटक भी आते हैं। यहां पवित्र पुष्कर झील है और नजदीक में ब्रह्मा जी का पवित्र मंदिर है जिससे प्रति वर्ष अनेक तीर्थयात्री यहां आते हैं।

तारागढ़ का किला

तारागढ़ किला तारागढ़ की पहाड़ी पर 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। तारागढ़ किला (दुर्ग) को गढ़ बीठली व अजयमेरु के नाम से भी जाना जाता है। इस किले का निर्माण 11वीं सदी में सम्राट अजय पाल चौहान ने मुगलों के आक्रमणों से रक्षा हेतु करवाया था। यह किला दरगाह के पीछे की पहाड़ी पर स्थित है। अजमेर की ऐतिहासिक धरोहर तारागढ़ दुर्ग की दीवारें व बुर्ज पर्यटकों को लुभाते हैं।

अढाई दिन का झोपडा

यह ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह से आगे कुछ ही दूरी पर स्थित है। इस खंडहरनुमा इमारत में 7 मेहराब एंव हिन्दू-मुस्लिम कारीगिरी के 70 खंबे बने हैं तथा छत पर भी शानदार कारीगिरी की गई है। आधे दिन का झोपड़ा एक मस्जिद है। कहा जाता है कि इसे केवल ढाई दिन के समय में बनाई गई। यह मस्जिद भारतीय-मुस्लिम वास्तुशैली का एक अच्छा उदाहरण है।

सोनी जी की नसियां

करोली के लाल पत्थरों से बना यह ख़ूबसूरत दिगंबर मंदिर जैन तीर्थंकर आदिनाथ का मंदिर है। लाल पत्थरों से बना होने के कारण इसे लाल मंदिर भी कहा जाता है। यह 1864-1865 ईस्वी का बना हुआ हैं।

अकबर का किला

अकबर का किला एक राजकीय संग्रहालय भी है। यहां प्राचीन मूर्तियां, सिक्के, पेंटिंग्स, कवच आदि रखे हुए हैं। अंग्रेजों ने यहीं से जनवरी 1616 में मुगल बादशाह जहांगीर से भारत में व्यापार करने की इजाजत मांगी थी। अकबर प्रति वर्ष ख्वाजा साहब के दर्शन करने तथा राजपुताना के युद्धों में भाग लेने के लिए यहां आया जाया करते थे।

कैसे पहुंचे

अजमेर तक वायुमार्ग, रेल या सड़क द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। जयपुर में स्थित संगनेर हवाई अड्डा अजमेर का निकटतम हवाई अड्डा है। अजमेर रेलवे स्टेशन निकटतम रेल मुख्यालय है और यहां से भारत के सभी प्रमुख शहरों के लिए रेल उपलब्ध हैं। राज्य के अन्य भागों से अजमेर सड़कमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।

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गर्मियों की छुट्टियों में अपने परिवार के साथ यहां करें सैर




भारत में पर्यटन स्थलों की भरमार है। अगर आप गर्मियों की छुट्टी में प्राकृतिक खूबसूरती को करीब से देखना चाहते है और वहां के बारे जानने चाहते है तो देर किस बात की अपना बैग पैक करें और निकल जाएं इन डेस्टिनेशन की सैर पर। यहां का हर टूरिस्ट स्पॉट अपने आप में खास है। हर साल देश-विदेश से लाखों पर्यटक यहां आकर अपनी छुट्टियों को यादगार बनाते हैं। अगर आप गर्मी की छुट्टियों को शांत और प्राकृतिक वातावरण में बिताना चाहते हैं तो अपने परिवार के साथ यहां का प्राकृतिक नजारों का लुत्फ उठा सकते हैं। पेश है कुछ समर डेस्टिनेशन जहां आप अपने परिवार के संग कुछ पल बिताएं:-

गोवा

गोवा शांतिप्रिय पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को बहुत भाता है। इसे 'पर्ल ऑफ ओरिएंट' व पर्यटकों का स्वर्ग कहते हैं। खूबसूरत समुद्री तट के लिए प्रसिद्ध गोवा देशी-विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। गोवा के तट (बीच) विश्व प्रसिद्ध हैं। यहां पर्यटकों का हमेशा आना जाना लगा रहता है। गोवा एक छोटा-सा राज्य है। यहां छोटे-बड़े लगभग 40 समुद्री तट है। गर्मियों में गोवा के समुद्री तटों पर टहलने, रेत और लहरों का आनंद लेने के लिए पर्यटक आते हैं। गोवा में पर्यटकों की भीड़ सबसे अधिक गर्मियों के महीनें में होती है।

लोनावाला

लोनावाला भारत के महाराष्ट्र राज्य में पुणे जिले का ख़ूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र है। यह पुणे के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। लोनावाला को सहयाद्रि श्रेणी का गहना भी कहा जाता है। शहर की भागदौड़ से दूर एक खुशनुमा वादियों वाला हिल स्टेशन लोनावाला है। मुंबई और पुणे का प्रवेश द्वार कहे जाने वाले लोनावाला को महाराष्ट्र का स्विटजरलैंड भी कहा जाता है। लोनावाला का सुहाना मौसम और प्राकृतिक सुंदरता पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है। शांत वातावरण, शुद्ध हवा और हरियाली के बीच छुट्टी बिताने के लिए लोनावाला आदर्श स्थान है।

शिमला

शिमला भारत के साथ-साथ पूरी दूनिया में अपने अनुपम सौंदर्य के कारण सैलानियों का पंसदीदा दर्शनीय स्थल रहा है। पहाड़ी ढलानों पर बने मकानों और खेतों, देवदार, चीड़ और माजू के जंगलों से घिरा शिमला बहुत आकर्षक दिखाई देता है। कालका से धीमी रफ्तार से चलती छोटी रेलगाड़ी से यहां आना सुखद महसूस होता है। शिमला की घाटियों में बहते झरने और मैदान शिमला की शोभा बढ़ाते हैं। शिमला की खोज अंग्रेजों ने सन् 1819 में की थी। चा‌र्ल्स कैनेडी ने यहां पहला ग्रीष्मकालीन घर बनाया था। जल्दी ही शिमला लॉर्ड विलियम बेन्टिन्क की नजरों में आ गया जो 1828 से 1835 तक भारत के गवर्नर जनरल थे। 19 वीं सदी के अतं में यहां ब्रिटिश वाइसरॉय के आवास (राष्ट्रपति निवास) का निर्माण हुआ था। आजकल इसमें इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी है। हिमाचल प्रदेश की राजधानी और ब्रिटिश कालीन समय में ग्रीष्म कालीन राजधानी शिमला राज्य का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन केंद्र है।

दार्जिलिंग

'क्वीन ऑफ हिल्स' यानी पहाड़ों की रानी' नाम मशहूर दार्जिलिंग छुट्टियां मनाने के लिए बेहतरीन शहर माना जाता है। पश्चिम बंगाल के इकलौते पर्वतीय पर्यटन स्थल दार्जिलिंग की गिनती विश्व के सबसे खूबसूरत पर्वतीय पर्यटन स्थलों में की जाती है। टॉय ट्रेन दार्जिलिंग के प्रसिद्ध हिल स्टेशन की सुंदर वादियों की सैर कराती है। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को 1999 में यूनेस्को द्धारा विश्व धरोंहरों की सूची में शामिल कर लिया गया था। दार्जिलिंग की यात्रा का खास आकर्षण हरे भरे चाय के बागान हैं। अब चाय के लिए ही दार्जिलिंग विश्व स्तर पर जाना जाता है।

पंचमढ़ी

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित पंचमढ़ी मध्य भारत के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में एक है। सतपुड़ा की पहाड़ियों पर बसा पंचमढ़ी मध्य प्रदेश का यह एकमात्र हिल स्टेशन है। हरे-भरे और शांत पंचमढ़ी में बहुत-सी नदियों और झरनों के गीत सैलानियों में मंत्रमुग्ध कर देते हैं। पंचमढ़ी घाटी की खोज 1857 में बंगाल लान्सर के कैप्टन जेम्स फोरसिथ ने की थी। इस स्थान को अंग्रेजों ने सेना की छावनी के रूप में विकसित किया। पंचमढ़ी में आज भी ब्रिटिश काल के अनेक चर्च  और इमारतें देखी जा सकती हैं। यहां घने जंगल, जलप्रपात और तालाब हैं। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान का भाग होने के कारण यहां आसपास बहुत घने जंगल हैं। यहां की गुफाएं पुरातात्विक महत्व की हैं क्योंकि यहां गुफाओं में शैलचित्र भी मिले हैं।

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वृंदावन जो मन में बस जाता है



वृंदावन वह जगह है जहां भगवान कृष्ण का बचपन गुजरा। जहां उन्होंने गोपियों संग रास किया। कृष्ण भारत में आनंद के देवता भी हैं और जीवन में उमंग लाने वाले देवता भी। यही कारण है कि वृंदावन में प्रवेश करते ही यहां के कण-कण में भक्ति और प्रेम का अहसास होने लगता है...

वृंदावन की हवाओं में कुछ अलग-सा कृष्णमय संगीत है, मानो वह अब भी राधे-राधे की माला जप रही हों। दिल्ली से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर वृंदावन आना एक अलग अनुभव है। ऐसाअनुभव, जिस शब्दों में बांधना आसान भी नहीं। यहां जिस भी ओर जाएंगे, कृष्ण की भक्ति भावना में लीन मंदिरों और साधारण से आलीशान आश्रम पाएंगे। देश-विदेश के कृष्ण भक्तों की भीड़ पाएंगे। वृंदावन विधवाओं की भी नगरी बनती जा रही है, जो वैधव्य के बाद कृष्ण के चरणों में जीवन बिताने के लिए इस शहर का रुख करती हैं।


कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ। फिर लालन-पालन वृंदावन में। लिहाजा यहां हर ओर कृष्ण समाए हुए हैं। हर ओर राधे-राधे है। हर ओर रसपूर्ण भक्तिभाव की यमुना है। जिस तरह गंगा उत्तर भारत के तमाम पवित्र स्थानों की जीवनदायिनी है, उसी तरह यहां यमुना जीवनदायिनी और पापनाशिनी है। माना जाता है कि यहां नहा लेने से आपके पाप नष्ट हो जाते हैं।

बांकेबिहारी मंदिर

वृंदावन में यूं तो एक से बढ़कर एक मंदिर हैं और सभी अपनी छटा और खूबियां लिए हुए हैं, लेकिन बांकेबिहारी मंदिर की तुलना और किसी से नहीं की जा सकती। मंदिर बाहर से राजस्थानी शैली की शानदार हवेली की तरह

लगता है। अंदर कृष्ण की खास शैली की मूर्ति विराजमान है। यहां दर्शन की बड़ी महत्ता है। हालांकि सप्ताहांत के दिनों में यहां बहुत ज्यादा भीड़ होती है। अन्य दिन कुछ सुकून लिए होते हैं। तब आप यहां न केवल दर्शन कर सकेंगे, बल्कि मंदिर के अंदर कृष्ण की जादुई मौजूदगी को महसूस करेंगे। मंदिर के अंदरूनी हाल की रोजाना गुब्बारों और फूलों से खास सजावट होती है। खास बूंदी के प्रसाद से कन्हैया का सत्कार। भक्तिभाव में डूबे दर्शनार्थियों का राधे-राधे करते हुए विभोर होना। बांके बिहारी मंदिर का निर्माण वर्ष 1864 में स्वामी हरिदास

ने कराया था। श्रीहरिदास विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजनकीर्तन से प्रसन्न हो निधिवन से बांकेबिहारी प्रकट हुए माने जाते हैं। बांके बिहारी मंदिर के बिल्कुल पास एक बहुत प्राचीन-सा ऊंचा गुंबदाकार मंदिर नजर आता है। गेरुए रंग का यह मंदिर मदन मोहन मंदिर है। कहा जाता है कि यह वृंदावन का पहलामंदिर था। औरंगजेब के शासनकाल में जब मथुरा और वृंदावन के मंदिरों को क्षति पहुंचाई जा रही थी, तब यहां से भगवान कृष्ण की मूर्ति को छिपाकर राजस्थान के करौली पहुंचा दिया गया। हमलावरों ने मंदिर शिखर व अन्य मूर्तियों

को छिन्न-भिन्न कर दिया। आज भी यह मंदिर खंडित अवस्था में है। भारतीय पुरातत्व विभाग ने मंदिर की पौराणिकता व कला को देखते हुए इसे अपने संरक्षण में ले लिया है। मंदिर के पास बना काली घाट आज भी सुरक्षित है, परंतु यमुना यहां से लगभग एक किलोमीटर दूर चली गई है।

यमुना घाट

यमुना में कई घाट हैं। सबकी अपनी छटा है और अपना महत्व। हर घाट से जुड़ी बाल कृष्ण की कहानियां हैं। कुछ घाट गुजरे जमाने के गवाह मात्र हैं। कुछ की हालत खस्ता है और कुछ को पिछले कुछ सालों में फिर से ठीक किया गया है। लेकिन इन सभी घाटों पर जाने पर कृष्ण से जुड़ी कोई न कोई कहानी जरूर मिल जाएगी। किसी घाट पर कृष्ण पहली बार स्नान करने उतरे होंगे। किसी पर उन्होंने कालिया नाग को मारा होगा। किसी घाट पर गोपियों का वस्त्र हरण करके ले गए होंगे, यानी जितने घाट कृष्ण से जुड़ी उतनी कहानियां। वृंदावन से कुछ किमी. की दूरी पर अक्रूर घाट है और पास में ही अक्रूर गांव है। इसके बारे में एक प्रसंग प्रचलित है कि जिस समय अक्रूर जी नंदगांव से श्रीकृष्ण और बलदेवजी को रथ में बिठाकर मथुरा ले जा रहे थे, तब मार्ग में यमुना के किनारे रथ रोक कर स्नान करने की इच्छा हुई। अक्रूर जी महाराज बड़े ज्ञानी थे। लेकिन उन्हें इस बात की चिंता थी कि कृष्ण-बलराम कंस का सामना कर पाएंगे या नहीं। अक्रूर जी ने जब यमुना में डुबकी लगाई, तब पानी के अंदर उन्हें भगवान कृष्ण और बलराम के दर्शन हुए। लेकिन उन्होंने जब अपना सिर पानी से बाहर निकाल कर देखा तो दोनों भाई रथ पर विराजमान थे। फिर जब दोबारा उन्होंने डुबकी लगाई तो भगवान के चतुर्भुज रूप के दर्शन हुए। यही स्थान अक्रूर घाट (अनन्त तीर्थ) कहलाता है। बारह पुराण में उल्लेख है राहु से ग्रसित सूर्य ग्रहण में

अक्रूर घाट पर स्नान करते हैं, तो राजसूय अश्वमेघ यज्ञ करने जैसा फल प्राप्त होता है।

वास्तविक वृंदावन

माना जाता है कि असली वृंदावन समय के साथ लुप्त हो गया था। साथ ही लीला स्थलियां भी। ये भी कहते हैं कि वर्तमान वृंदावन असली या प्राचीन वृंदावन नहीं है। वह शायद गोवर्धन के करीब था।

हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण आदि में वृंदावन की महिमा के बारे में बताया गया है तो कालिदास ने रघुवंश में इंदुमती- स्वयंवर के प्रसंग में इसका उल्लेख किया है। श्रीमद्भागवत के अनुसार कंस के अत्याचार से बचने के लिए नंदजी कुटुंबियों और सजातीयों के साथ गोकुल से वृंदावन रहने के लिए आ गए थे।

रहस्यमयी निधिवन

वृंदावन की सबसे रहस्यमयी जगह है निधिवन। अजीबोगरीब तरीके से झुके हुए वृक्षों का बगीचा। ऐसा लगता

है कि हर वृक्ष की डाली नृत्य मुद्रा में है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण आज भी हर रात निधिवन में आते हैं

और राधा के साथ रास रचाते हैं। बाग के बीचों-बीच एक मंदिर है, जिसमें एक शय्या लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती है। कहा जाता है कि बांके बिहारी जी की असल मूर्ति इसी वन में प्रकट हुई थी। रात के समय यहां प्रवेश मना है। कहा तो यहां तक जाता है कि दिन के समय निधिवन में वास करने वाले बंदर, पक्षी और



अन्य प्राणी

यहां से कहीं और चले जाते हैं। हाल के कुछ दशकों में यहां कई आकर्षक मंदिरों का निर्माण हुआ है। इनमें कृष्ण

बलराम इस्कॉन मंदिर, प्रेम मंदिर, राधा वल्लभ मंदिर आदि उल्लेखनीय हैं। यहां का विशालतम मंदिर रंगजी

के नाम से प्रसिद्ध है। कृष्ण बलराम मंदिर (इस्कॉन टेंपल) को यहां के लोग अंग्रेजों का मंदिर भी कहते हैं।

दुनियाभर में यूं तो इस्कॉन मंदिरों की श्रृंखला है, लेकिन वृंदावन की इस मंदिर की बात ही निराली है। यहां

आमतौर पर लोग नाचते-गाते और आनंद में लीन लगते हैं। इस्कॉन द्वारा अब वृंदावन में ही दुनिया के सबसे

ऊंचे (करीब दो सौ मीटर) चंद्रोदय मंदिर का निर्माण भी कराया जा रहा है। प्रेम मंदिर अपनी वास्तुकला और

दीवारों पर उकेरी भव्य कला से मन मोह लेता है।

देश-विदेश में प्रसिद्ध कृपालु महाराज द्वारा बनवाया गया यह मंदिर हर मायने में खासा सुंदर और बेहद साफ-सुथरा है। यहां कृष्ण की अप्रतिम झांकियां हैं। प्रेम मंदिर परिसर बेहद दर्शनीय है। हां, अगर आपने इसे रात में जगमगाते हुए नहीं देखा, तो यकीन मानिए कि एक शानदार अनुभव से वंचित रह जाएंगे। साध्वी ऋतंबरा का वात्सल्य ग्राम भी वृंदावन के खास आकर्षणों में से एक है। लंबे भू-भाग पर बसा यह आश्रम अनाथ बच्चों को आश्रय देता है। यहां की व्यवस्था प्राचीन गुरुकुलों की तरह कीगई है। हां, यहां की चाट और वृंदावनी लस्सी का भी जवाब नहीं। कृष्ण की इस नगरी में गए और लस्सी नहीं पीया, तो क्या किया। वृंदावन की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहां आने के बाद यह आपके अंदर बस जाएगा और हमेशा याद आता रहेगा।
     

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गर्मी में चलें जन्नत सा खूबसूरत शहर, जहां स्‍वर्ग में होने का हो अहसास



कहा जाता है कि धरती पर स्वर्ग अगर कहीं है तो वह कश्मीर में ही है। कश्मीर को यह उपमा दी तो गई है उसके प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत होकर, लेकिन इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की दृष्टि से भी यह कुछ कम समृद्ध नहीं है। शंकराचार्य मंदिर और हजरतबल की पवित्रता, नागिन झील व डल झील का झिलमिलाता सौंदर्य, मुगल उद्यानों का शाही अंदाज, हिमशिखरों का धवल सौंदर्य और सुकून देती आबोहवा, ये सब ऐसा सघन आमंत्रण देते हैं, जिससे इनकार कर पाना किसी के लिए संभव नहीं है। सचमुच कश्मीर घाटी इतनी सुरम्य है जो सबके मन को बांध लेने में सक्षम है। कश्मीरी भाषा में इसे ‘ऋषिवार’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है देव भूमि। कश्मीर के उदय की कथा से भी ऐसा ही प्रतीत होता है।

एक शहर सपने सा
बचपन से सुनते आए हैं कि कश्मीर जन्नत है! यहां शालीमार का 
रास्ता डल झील के किनारे से गुजरता है। पहली नजर में डल झील के शिकारे और हाउसबोट के पीछे दूर नीली सिलेटी धुंध से झांकती पहाडि़यों ने ऐसा समा बांधा है, मन लाल रंग के फूलों से आकर्षित हो जाता। ऊंची दीवारों से लटकती हरी बेलें और लाल रंग के फूलों को देखकर लगेगा कि बनाने वाले ने जन्नत की खूबसूरती में चार चांद लगाने की कोशिश की होगी। शालीमार बाग खास मुगल शैली में सीढ़ीदार चरणों में बना है। इसके पीछे पहाड़ होने के कारण इसकी खूबसूरती काफी बढ़ जाती है। श्रीनगर आइए, डल के आसपास घूमिए और हाउसबोट में न रहिए ऐसा नहीं हो सकता। पानी पर संपन्न घर के ठाठ की कल्पना कभी आपने की हो तो यहां आइएगा। लंदन व एम्सटरडम में भी लोग नाव पर रहते हैं लेकिन हाउसबोट की बात ही कुछ और है।

गुलमर्ग, सोनमर्ग व पहलगाम

श्रीनगर से कुल 55 किमी दूर गुलमर्ग है। अगर गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकार्ड में सबसे ज्यादा फिल्म शूटिंग वाले स्थान का मुकाबला हो तो गुलमर्ग शर्तिया सबको हरा देगा। गुलमर्ग का गोल्फ कोर्स और उसके बीचोबीच बना गिरजाघर ही यहां के मुख्य आकर्षण हैं। श्रीनगर से करीब 90 किमी दूर लेह के रास्ते में है सोनमर्ग। बड़े फैले हुए पहाड़ी ढलान और यहां से पांच किमी दूर थजवास ग्लेशियर सोनमर्ग के मुख्य आकर्षण हैं। अनंतनाग से एक या डेढ़ घंटे की दूरी पर है पहलगाम। इसके आसपास कई पिकनिक स्पॉट हैं, पर सबसे जानी-पहचानी जगह चंदनबाड़ी है। जहां से अमरनाथ की गुफा के लिए ट्रैक शुरू होता है।

नियमित हवाई उडानें

श्रीनगर पहुंचना कोई मुश्किल नहीं है। दिल्ली व चंडीगढ़ के अलावा कई शहरों से यहां के लिए सीधी उड़ाने हैं। सड़क से भी यह देश के प्रमुख महानगरों से जुड़ा हुआ है। रेलमार्ग से जम्मू तक पहुंचा जा सकता है। आगे की दूरी सड़कमार्ग से ही तय करनी होगी। ठहरने के लिए यहां सभी तरह के होटल हैं।

व्यंजन गुश्ताबा होता है और यह भी रिस्ते की तरह की मटन बॉल होती है। शाकाहारियों के लिए यहां दम आलू और चमन नाम की दो सब्जियां मिल सकती हैं। रोटी पसंद करने वाले शीरमाल का मजा ले सकते हैं। बकरखानी भी एक किस्म की पेस्ट्रीनुमा कश्मीरी ब्रेड होती है, जो अकसर सुबह के नाश्ते में ही खाई जाती है। पेयों में दो खास कश्मीरी पेय-कहवा और नूनचाय हैं। नूनचाय असल में गुलाबी रंग की नमकीन चाय होती है और जिन्हें इसका स्वाद नहीं है, उनके लिए इसे पीना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। वे लोग मीठे कहवा से काम चला सकते हैं। श्रीनगर में रेजिडेंसी रोड पर मुगल दरबार, अहदूस और ग्रैंड रेस्तरां में आपको इच्छा वाजवान मिल सकता है। सस्ते रेस्तरां और बेकरीज के लिए आप डल गेट या शेरवानी रोड का रुख कर सकते हैं।

कश्यप मार से कश्मीर

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहॉ विस्तृत घाटी के स्थान पर कभी मनोरम झील थी जिसके तट पर देवताओं का वास था। कश्मीर के प्राचीन इतिहास और यहां के सौंदर्य का वर्णन कल्हण रचित ‘राज तरंगिनी’ में बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। वैसे इतिहास के लंबे कालखंड में यहां मौर्य, कुषाण, हूण, करकोटा, लोहरा, मुगल, अफगान, सिख और डोगरा राजाओं का राज रहा है। कश्मीर सदियों तक एशिया में संस्कृति एवं दर्शन शास्त्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा और सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

हर मौसम की छटा अनूठी धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर ग्रेट हिमालयन रेंज और पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला के मध्य स्थित है। यहां की नैसर्गिक छटा हर मौसम में एक अलग रूप लिए ऩजर आती है। गर्मी में यहां हरियाली का आंचल फैला दिखता है, तो सेबों का मौसम आते ही लाल सेब बागान में झूलते नजर आने लगते हैं। सर्दियों में हर तरफ बर्फकी चादर फैलने लगती है और पतझड़ शुरू होते ही जर्द चिनार का सुनहरा सौंदर्य मन मोहने लगता है। पर्यटकों को सम्मोहित करने के लिए यहां बहुत कुछ है। शायद इसी कारण देश-विदेश के पर्यटक यहां खिंचे चले आते हैं। वैसे प्रसिद्ध लेखक थॉमस मूर की पुस्तक ‘लैला रूख’ ने कश्मीर की ऐसी ही खूबियों का परिचय पूरे विश्व से कराया था।

झील पर तैरता शहर
यहां आने वाला हर सैलानी सबसे पहले श्रीनगर पहुंचता है, जो कि यहां का प्रमुख शहर तथा राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। श्रीनगर घाटी का मुख्य व्यावसायिक केंद्र भी है। अन्य पर्वतीय स्थलों की तुलना में यह शहर कुछ अलग लगता है। यहां के घर व बा़जार पहाड़ी ढलानों पर नहीं बसे। एक विस्तृत घाटी के मध्य स्थित होने के कारण यह मैदानी शहरों जैसा लगता है। किंतु पृष्ठभूमि में दिखाई पड़ते बर्फाच्छादित पर्वत शिखर यह एहसास कराते हैं कि सैलानी वास्तव में समुद्रतल से 1730 मीटर ऊंची सैरगाह में हैं।

श्रीनगर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां की डल झील है। जहां सुबह से शाम तक रौनक ऩजर आती है। सैलानी घंटों इसके किनारे घूमते रहते हैं या शिकारे में बैठ नौका विहार का लुत्फउठाते हैं। दिन के हर प्रहर में इस झील की खूबसूरती का कोई अलग रंग दिखाई देता है। देखा जाए तो डल झील अपने आपमें एक तैरते नगर के समान है। तैरते आवास यानी हाउसबोट, तैरते बाजार और तैरते वेजीटेबल गार्डन इसकी खासियत हैं।

कई लोग तो डल झील के तैरते घरों यानी हाउसबोट में रहने का लुत्फलेने के लिए ही यहां आते हैं। हाउसबोट में रहने वालों को जब कहीं आना-जाना होता है तो पहले वे शिकारे से सड़क तक आते हैं। झील के सौंदर्य को निरखने के लिए शिकारे से जरूर घूमना चाहिए। इस तरह घूमते हुए शॉल, केसर, आभूषण, फूल आदि बेचने वाले अपने शिकारे में सजी दुकान के साथ आपके करीब आते रहेंगे। यही नहीं, आप पानी में तैरते फोटो स्टूडियो में कश्मीरी ड्रेस में अपनी तसवीर भी खिंचवा सकते हैं।
झील के मध्य एक छोटे से टापू पर नेहरू पार्क है। वहां से भी झील का रूप कुछ अलग नजर आता है। दूर सड़क के पास लगे सरपत के ऊंचे झाड़ों की कतार, उनके आगे चलता ऊंचा फव्वारा बड़ा मनोहारी मंजर प्रस्तुत करता है। झील के आसपास पैदल घूमना भी सुखद लगता है। शाम होने पर भी यह झील जीवंत ऩजर आती है। सूर्यास्त के समय आकाश का नारंगी रंग झील को अपने रंग में रंग लेता है, तो सूर्यास्त के बाद हाउसबोट की जगमगाती लाइटों का प्रतिबिंब झील के सौंदर्य को दुगना कर देता है। शाम के समय यहां खासी भीड़ नजर आती है। भीड़-भाड़ से परे शांत वातावरण में किसी हाउसबोट में रहने की इ’छा है तो पर्यटक नागिन लेक या झेलम नदी पर खड़े हाउसबोट में ठहर सकते हैं। नागिन झील भी कश्मीर की सुंदर और छोटी-सी झील है। यहां प्राय: विदेशी सैलानी ठहरना पसंद करते हैं। उधर झेलम नदी में छोटे हाउसबोट होते हैं।


बादशाहों का उद्यान प्रेम

मुगल बादशाहों को वादी-ए-कश्मीर ने सबसे अधिक प्रभावित किया था। यहां के मुगल गार्डन इस बात के प्रमाण हैं। ये उद्यान इतने बेहतरीन और नियोजित ढंग से बने हैं कि मुगलों का उद्यान-प्रेम इनकी खूबसूरती के रूप में यहां आज भी झलकता है। मुगल उद्यानों को देखे बिना श्रीनगर की यात्रा अधूरी-सी लगती है। अलग-अलग खासियत लिए ये उद्यान किसी शाही प्रणय स्थल जैसे नजर आते हैं। शाहजहां द्वारा बनवाया गया चश्म-ए-शाही इनमें सबसे छोटा है। यहां एक चश्मे के आसपास हरा-भरा बगीचा है। इससे कुछ ही दूर दाराशिकोह द्वारा बनवाया गया परी महल भी दर्शनीय है। निशात बाग 1633 में नूरजहां के भाई द्वारा बनवाया गया था। ऊंचाई की ओर बढ़ते इस उद्यान में 12 सोपान हैं। शालीमार बाग जहांगीर ने अपनी बेगम के लिए बनवाया था। इस बाग में कुछ कक्ष बने हैं। अंतिम कक्ष शाही परिवार की स्ति्रयों के लिए था। इसके सामने दोनों ओर सुंदर झरने बने हैं। मुगल उद्यानों के पीछे की ओर जावरान पहाडि़यां हैं, तो सामने डल झील का विस्तार नजर आता है। इन उद्यानों में चिनार के पेड़ों के अलावा और भी छायादार वृक्ष हैं। रंग-बिरंगे फूलों की तो इनमें भरमार रहती है। इन उद्यानों के मध्य बनाए गए झरनों से बहता पानी भी सैलानियों को मुग्ध कर देता है। ये सभी बाग वास्तव में शाही आरामगाह के उत्कृष्ट नमूने हैं।

फूलों का मैदान
कश्मीर घाटी में श्रीनगर से दूर भी किसी दिशा में निकल जाएं तो प्रकृति के इतने रूप देखने को मिलते हैं कि लगता है जैसे उसने अपना खजाना यहीं समेट रखा है। राजमार्गो पर लगे दिशा-निर्देशों पर लिखे अनेक शहरों के नाम सैलानियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन अधिकतर सैलानी, गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम आदि घूमने जाते हैं। गुलमर्ग के रास्ते में कई छोटे सुंदर गांव और आसपास धान के खेत आंखों को सुहाते हैं। सीधी लंबी सड़क के दोनों और ऊंची दीवार के समान दिखाई पड़ती पेड़ों की कतार अत्यंत भव्य दिखाई देती है। पुरानी फिल्मों में इन रास्तों के बीच फिल्माए गीत पर्यटकों को याद आ जाते हैं। तंग मार्ग के बाद ऊंचाई बढ़ने के साथ ही घने पेड़ों का सिलसिला शुरू हो जाता है। कुछ देर बाद सैलानी गुलमर्ग पहुंचते हैं तो घास का विस्तृत तश्तरीनुमा मैदान देख कर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। जिस प्रकार उत्तराखंड में पहाड़ी ढलवां मैदानों को बुग्याल कहते हैं, कश्मीर में उन्हें ‘मर्ग’ कहते हैं। गुलमर्ग का अर्थ है ‘फूलों का मैदान’। समुद्र तल से 2680 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुलमर्ग सैलानियों के लिए वर्ष भर का रेसॉर्ट है। यहां से किराये पर घोड़े लेकर खिलनमर्ग, सेवन स्पि्रंग और अलपत्थर जैसे स्थानों की सैर भी कर सकते हैं।

विश्व का सबसे ऊंचा गोल्फकोर्स भी यहीं है। सर्दियों में जब यहां ब़र्फ की मोटी चादर बिछी होती है तब यह स्थान हिमक्रीड़ा और स्कीइंग के शौकीन लोगों के लिए तो जैसे स्वर्ग बन जाता है। यहां चलने वाली गंडोला केबल कार द्वारा ब़र्फीली ऊंचाइयों तक पहुंचना रोमांचक लगता है। ढलानों पर लगे चीड़ या देवदार के पेड़ों पर ब़र्फलदी दिखती है। तमाम पर्यटक बर्फ पर स्कीइंग का आनंद लेते हैं तो बहुत से स्लेजिंग करके ही संतुष्ट हो लेते हैं। यहां पर्यटक चाहें तो स्कीइंग कोर्स भी कर सकते हैं। हर वर्ष होने वाले ‘विंटर गेम्स’ के समय यहां विदेशी सैलानी भी बड़ी तादाद में आते हैं।

निराली सैरगाह
सोनमर्ग भी कश्मीर की एक निराली सैरगाह है। समुद्र तल से लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह एक रमणीक स्थल है। सिंध नदी के दोनों और फैले यहां के ‘मर्ग’ सोने से सुंदर दिखाई देते हैं। इसीलिए इसे सोनमर्ग अर्थात सोने का मैदान कहा गया होगा। सोनमर्ग से घुड़सवारी करके थाजिवास ग्लेशियर भी देखने जा सकते हैं। वहां ग्लेशियर पर घूमने का आनंद भी लिया जा सकता है। अनंत हिमनदों के सामने खड़े होकर प्रकृति की विशालता का एहसास मन में रोमांच उत्पन्न कर देता है। प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा का एक मार्ग सोनमर्ग से बालटाल होकर भी है।

यहां से लद्दाख के रास्ते में पड़ने वाला जोजीला दर्रा 30 किमी दूर है।

पहलगाम का रास्ता भी सैलानियों को बहुत प्रभावित करता है। मार्ग में पाम्पोर में केसर के खेत दिखाई देते हैं। जगह-जगह क्रिकेट के बैट रखे नजर आते हैं। यहां ‘विलो-ट्री’ की लकड़ी से ये बैट बनते हैं। इनके अलावा अवंतिपुर में 9 वीं शताब्दी में बने दो मंदिरों के भग्नावशेष तथा मार्तड का सूर्य मंदिर भी आकर्षक हैं। सागरतल से 2130 मीटर की ऊंचाई पर बसा पहलगाम कभी चरवाहों का छोटा सा गांव था। किंतु यहां बिखरी नैसर्गिक छटा ने इसे खुशनुमा सैरगाह बना दिया। लिद्दर नदी इसकी छटा को और बढ़ाती है। नदी पर कई जगह बने लकड़ी के पुल और दूर दिखते हिमशिखर तो पिक्चर पोस्टकार्ड से दृश्य प्रस्तुत करते हैं। देवदार के जंगल, झरने और फूलों के मैदान तो जगह-जगह ऩजर आएंगे। बैसरन के मर्ग, आडु, चंदनवाड़ी जैसे स्थान घोड़ों पर बैठकर घूमे जा सकते हैं। साहसी पर्यटक पहलगाम से तरसर, मरसर झीलें, दुधसर झील और कोलहाई ग्लेशियर जैसे ट्रेकिंग रूटों पर निकल सकते हैं।

सैलानियों को आकर्षित करने वाले अन्य स्थानों में कोंकरनाग 2012 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान औषधीय गुणों वाले प्राकृतिक चश्मों के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीरी भाषा में ‘नाग’ का अर्थ ‘चश्मा’ भी होता है। ‘वेरीनाग’ में भी कुछ प्राकृतिक चश्में हैं। यहां बादशाह जहांगीर ने चश्मों का जल एक ताल में एकत्र कर उसके आसपास एक उद्यान बनवाया था। 80 मीटर के दायरे में फैले आठ कोणों वाले इस ताल एवं उद्यान में चिनार के वृक्षों की कतारें सैलानियों का मन मोह लेती है।

वास्तव में कश्मीर को प्रकृति ने इतने रंगों से संवारा है कि उसकी खूबसूरती शब्दों में बयान कर पाना मुश्किल है। संस्कृति और जीवन शैली के रंग भी सैलानी पर इतना प्रभाव छोड़ते हैं कि वह बार-बार यहां आना चाहता है।


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